समस्तीपुर में चारा संकट ने पशुपालकों को किया बेहाल, नहीं है एक भी चरागाह

जैसे जैसे जनसंख्या बढ़ती जा रही है, लोगों के समक्ष बेरोजगारी भी एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। विशेष रुप से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार या व्यवसाय के अवसर कम होने के कारण अब लोग रोजगार के दूसरे साधन तलाशने शुरू कर चुके हैं। जनसंख्या बढ़ने के साथ-साथ खेती योग्य भूमि भी घटने लगी है। बढ़ रहे शहरीकरण ने इसे और प्रभावित किया है। प्रति व्यक्ति खेती के लिए भूमि अब काफी कम क्षेत्रफल में उपलब्ध है। नतीजा यह कि आब बड़े पैमाने पर लोग पशुपालन की ओर बढ़ रहे हैं, किंतु उनके लिए भी स्थितियां प्रतिकूल ही नजर आ रही है। खेती योग्य भूमि कम रहने और प्रतिकूल मौसम के कारण पशुपालकों को चारा के भीषण संकट का सामना करना पड़ रहा है। हरा चारा नहीं रहने के कारण लोग बड़ी कीमतों पर पशु दाना और भूसा खरीद कर खिला रहे हैं।

नहीं है एक भी चारागाह

पटोरी में एक भी चारागाह उपलब्ध नहीं है जहां किसान अपने पशुओं को लेकर उन्हें हरा चारा खिला सकें। न तो सरकारी स्तर पर इसकी व्यवस्था है और न हीं लोगों के पास उतनी जमीन है कि वह हरा चारे का उत्पादन कर सकें। नतीजा यह है कि पशुपालक भूसा, अनाज का दाना और पशु आहार खरीद कर अपने पशुओं को खिला रहे हैं।

बाढ़ और बरसात ने बिगाड़ दी पशुपालकों की हालत

चारागाह के रूप में पशुपालक किसी विद्यालय, कॉलेज के मैदानों का प्रयोग किया करते थे। इतना ही नहीं नदी, तालाब, सड़क आदि के किनारे अपने पशुओं को नित्य हरा चारा खिलाने के लिए ले जाते थे। किंतु बाढ़ के कारण इसकी भी समस्या विकट हो गई है। नदी-तालाब लबालब भरे हुए हैं। सड़क के किनारे भी जलजमाव की स्थिति बनी हुई है। अधिकांश खेतों में भी पानी भरा है। खरीफ की फसल के रूप में लोग अपनी खेतों में जनेरा या बाजरे की खेती कर इसका प्रयोग पशु आहार के रूप में किया करते थे किंतु इस वर्ष वर्षा और बाढ़ के कारण सभी घास वाली फसलें डूब गईं। नतीजा यह है कि लोग हरे चारे के लिए लालायित हैं।

ऊंची कीमतों पर खरीद रहे पशु आहार

पशु आहार के के रूप में लोगों को सिर्फ भूसा और पशु दाना का ही प्रयोग करना पड़ रहा है। लोग मक्के, गेहूं, दाल आदि का प्रयोग पशुओं को खिलाने के लिए कर रहे हैं। इनकी कीमत काफी अधिक है। नतीजा यह है कि वे पशु आहार के रूप में काफी अधिक व्यय करना पड़ रहा है।

उत्पादन से अधिक लागत के कारण पशुपालक हो रहे परेशान

चारा उत्पादन नहीं होने के कारण किसान अब 11 सौ रुपए क्विंटल भूसा खरीद कर अपने मवेशियों को खिला रहे हैं। इसके साथ लगभग 18 रुपए किलो गेहूं, 16 रुपए किलो मकई , 60 रुपए किलो पशु दाल 55 से 60 रुपए किलो तीसी की खल्ली, 24 रुपए किलो पशु आहार खरीद कर अपने मवेशियों को खिला रहे हैं। नतीजा यह है कि उत्पादन से अधिक लागत के कारण प्रतिदिन घाटा का सामना करना पड़ रहा है। दूध की कीमत 40 रुपए प्रति लीटर से कम है। नतीजा यह है कि दूध का उत्पादन काफी कम हो रहा है।

पशुपालक बेच रहे हैं अपनी गाय व भैंस

चारा उपलब्ध नहीं होने और महंगी कीमत पर सामान मिलने के कारण कई पशुपालक अब अपनी गाय और भैंस को बेच रहे हैं। जिनके पास गाय और भैंस है भी उनमें दूध का उत्पादन काफी कम हो गया है। नतीजा यह है कि स्थानीय स्तर पर दूध की भी किल्लत होती जा रही है।

कहते हैं पशुपालक

-ऊंची कीमत पर सामान खरीद कर पशुओं को खिलाना घाटे का सौदा हो गया है। विशेष रूप से जब मवेशी दूध देना बंद कर देते हैं वैसी स्थिति में किसान बिना उत्पादन के ही खाना खिलाते हैं। – नित्यानंद राय, किसान, शाहपुर पटोरी
-चारा की किल्लत के कारण अब पशुपालक अपनी मवेशी बेच रहे हैं। पशुपालकों को मवेशी की भी सही कीमत नहीं मिल रही है – जितेंद्र राय, पशुपालक, सुल्तानपुर छौड़ाही

Input- Jagran